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Entertainment News: लव सॉन्ग नहीं है ‘सम्मी मेरी वार’, मां के दर्द और बेटी के बलिदान से जुड़ी है लोककथा

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | सोशल मीडिया पर लोकप्रिय पंजाबी लोकगीत ‘सम्मी मेरी वार’ को अक्सर प्रेम गीत समझा जाता है, लेकिन इससे जुड़ी लोककथा एक मां के दर्द और बेटी के बलिदान की कहानी बताती है।

21 सितंबर 2026। Alam Ki Khabar। सोशल मीडिया पर किसी पुराने लोकगीत की धुन अचानक लोकप्रिय हो जाए तो नई पीढ़ी उसे अपने अंदाज में सुनने लगती है। पंजाबी लोकधुन ‘सम्मी मेरी वार’ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। इसकी भावपूर्ण धुन और शब्दों के कारण कई श्रोता इसे प्रेम या विरह से जुड़ा गीत मान लेते हैं। हालांकि, इससे जुड़ी एक प्रचलित लोककथा इसे मां की बेटी के प्रति करुण पुकार और प्रकृति की रक्षा के लिए दिए गए बलिदान से जोड़ती है।

यह कहानी पंजाब के पुराने लोक-सांस्कृतिक क्षेत्र और सैंडल बार से जुड़ी बताई जाती है। हालांकि, इसके अलग-अलग मौखिक संस्करण मिलते हैं और लोककथाओं की तरह इसकी हर घटना का ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध होना जरूरी नहीं है। यही वजह है कि इसे प्रमाणित इतिहास के बजाय लोकपरंपरा के रूप में समझना अधिक उचित है।

कौन थी सम्मी?

लोककथा के अनुसार पुराने पंजाब के सैंडल बार क्षेत्र में सम्मी नाम की एक साहसी युवती रहती थी। उसे प्रकृति और पेड़ों से गहरा लगाव था। कहानी के मुताबिक उस समय एक शासक ने अपनी रानी के लिए महल बनवाने का फैसला किया था।

महल के निर्माण के लिए लकड़ी की आवश्यकता बताई गई और सैनिकों को एक पुराने विशाल पेड़ को काटने के लिए भेजा गया। ग्रामीण इस पेड़ को बचाना चाहते थे। कहा जाता है कि सम्मी भी सैनिकों के सामने खड़ी हो गई और पेड़ काटे जाने का विरोध किया।

लोककथा का सबसे मार्मिक हिस्सा यहीं से शुरू होता है। बताया जाता है कि सम्मी ने पेड़ को बचाने के लिए अपने प्राण तक देने की बात कही। सैनिकों ने कथित तौर पर शासक के आदेश का पालन किया और सम्मी की मृत्यु के बाद पेड़ भी काट दिया गया।

बेटी की मौत ने मां को तोड़ दिया

कहानी के अनुसार जब सम्मी की मां को बेटी की मौत की जानकारी मिली तो वह गहरे सदमे में चली गई। बेटी के वियोग में उसकी पुकार लोकधुन का हिस्सा बन गई।

यही वह भाव है जिसे ‘सम्मी मेरी वार’ से जुड़ी लोकपरंपरा में सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। गीत में रात की लंबाई और अंधेरे का जिक्र प्रेमी-प्रेमिका के विरह के रूप में सुनाई दे सकता है, लेकिन लोकव्याख्या में इसे बेटी के बिछड़ने के बाद मां के दुख से जोड़ा जाता है।

इसी कारण इस गीत की धुन में मौजूद उदासी को केवल रोमांटिक भावनाओं तक सीमित नहीं किया जाता। इसके पीछे मातृत्व, बिछड़ने का दर्द और प्रकृति से जुड़ी संवेदना की कहानी सुनाई जाती है।

‘रातां लंबियां कालियां नी समिए’ का भाव

गीत की चर्चित पंक्ति ‘रातां लंबियां कालियां नी समिए’ को लोकपरंपरा में मां की पुकार के तौर पर समझाया जाता है। इसका भाव है कि बेटी सम्मी के बिना रातें लंबी और अंधेरी हो गई हैं।

यही भाव गीत को सामान्य प्रेम गीतों से अलग पहचान देता है। यहां विरह जरूर है, लेकिन लोककथा के अनुसार यह विरह किसी प्रेमी का नहीं बल्कि अपनी बेटी को खो चुकी मां का है।

हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और गायन परंपराओं में लोकगीतों के अर्थ और कथानक की व्याख्या अलग हो सकती है। इसलिए इस गीत के पीछे बताई जाने वाली कहानी को एक लोकमान्यता के रूप में देखना जरूरी है।

बारिश से भी जुड़ी है लोकमान्यता

‘सम्मी मेरी वार’ से जुड़ी लोकपरंपरा में एक और दिलचस्प मान्यता का उल्लेख मिलता है। सैंडल बार और चोलिस्तान के रेगिस्तानी इलाकों में लंबे समय तक बारिश नहीं होने पर लोगों द्वारा इस लोकगीत को सामूहिक रूप से गाने की बात कही जाती है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार मां के दुख से भरी इस पुकार को सुनकर बादल भी द्रवित हो जाते हैं और बारिश होती है। यह विश्वास लोककथा का हिस्सा है, इसका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

रेगिस्तानी जीवन में बारिश का महत्व बेहद अधिक रहा है। इसलिए बारिश की प्रतीक्षा, बादलों और लोकगीतों का आपस में जुड़ना वहां की लोकसंस्कृति में भावनात्मक रूप से स्वाभाविक दिखाई देता है।

सोशल मीडिया ने फिर पहुंचाया नई पीढ़ी तक

आज इंस्टाग्राम रील्स और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पुराने लोकगीतों की धुनें नए रूप में सामने आ रही हैं। ‘सम्मी मेरी वार’ भी इसी प्रक्रिया के कारण युवा श्रोताओं तक नए अंदाज में पहुंचा है।

कई लोग इसकी धुन सुनकर इसे प्रेम या रोमांटिक गीत समझते हैं। लेकिन इसके साथ जुड़ी लोककथा जानने के बाद गीत का भाव पूरी तरह अलग नजर आता है।

यह कहानी लोकगीतों की उस ताकत को भी दिखाती है, जिसमें किसी समाज की स्मृति, दुख, प्रकृति के प्रति लगाव और मान्यताएं पीढ़ियों तक गीतों के जरिए आगे बढ़ती रहती हैं।

इतिहास और लोककथा में फर्क समझना जरूरी

सम्मी की कहानी बेहद भावुक है, लेकिन इसे पेश करते समय लोककथा और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर समझना जरूरी है। इस कथा के अलग-अलग संस्करण मौखिक परंपराओं में मिलते हैं और कहानी के सभी पात्रों तथा घटनाओं के संबंध में समान ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

इसलिए ‘सम्मी मेरी वार’ की कहानी को लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपरा के संदर्भ में देखना ज्यादा उचित है। गीत का सांस्कृतिक महत्व इससे कम नहीं होता, बल्कि यह समझने में मदद मिलती है कि लोकसंगीत किस तरह इतिहास, स्मृति और कल्पना के बीच अपनी जगह बनाता है।

आज फिर क्यों चर्चा में है ‘सम्मी मेरी वार’?

डिजिटल दौर में लोकगीतों को नई पहचान मिल रही है। एक तरफ नए संगीत प्रयोग इन धुनों को युवाओं तक पहुंचा रहे हैं, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर लोग इनसे जुड़ी कहानियां भी तलाश रहे हैं।

‘सम्मी मेरी वार’ के मामले में भी यही हुआ है। जो धुन किसी को पहली बार सुनने पर प्रेम और विरह का गीत लग सकती है, उसके पीछे जुड़ी लोककथा उसे मातृत्व, बलिदान और प्रकृति से जोड़ देती है।

यही वजह है कि यह गीत केवल सुनने की धुन नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसी लोकपरंपरा का हिस्सा बन जाता है जिसमें एक मां का दुख और एक बेटी के साहस की कहानी पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण: लोकगीत की असली ताकत उसकी कहानी में है

लोकगीतों की खूबसूरती केवल उनकी धुन में नहीं होती। उनके भीतर किसी समाज की स्मृतियां, भावनाएं और सांस्कृतिक अनुभव भी सुरक्षित रहते हैं। ‘सम्मी मेरी वार’ से जुड़ी लोककथा भी यही बताती है कि किसी गीत को समझने के लिए उसके शब्दों और संगीत के साथ उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को जानना जरूरी है।

सोशल मीडिया ने इस लोकधुन को नई पीढ़ी तक पहुंचाया है। अब जरूरत यह है कि वायरल होने वाली लोकपरंपराओं को सुनते समय उनके पीछे की मान्यताओं और इतिहास को भी समझा जाए और लोककथा को तथ्यात्मक इतिहास के रूप में पेश करने से बचा जाए।

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